Monday, 22 September 2025

भारत–अमेरिका रिश्ते: छद्म सहयोग या स्थायी अभिशाप?

भारत–अमेरिका रिश्तों का क्रमिक इतिहास (1947–2025)

USA — भारत का दोस्त, चालाक साझेदार या अवसरवादी प्रतिद्वंद्वी?


1947–2025 की घटनाओं की रोशनी में इस सवाल के कई जवाब मिलते हैं।
 आप खुद भी सोचिए — पहले कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सामने रख रहा हूं, फिर अपने विचार!

भारत–अमेरिका रिश्तों का क्रमिक संक्षिप्त इतिहास (1947–2025)

यह 1947 से 2025 तक भारत और अमेरिका के रिश्तों का वार्षिक/कालखंडवार सार है। इसमें तीसरे देशों (पड़ोसी व मुस्लिम राष्ट्र, यूरोप, ब्रिटेन आदि) के माध्यम से किये गए दबाव, सैन्य सहयोग/अड्डे, फंडिंग व प्रतिबंध (sanctions) भी शामिल हैं।

1947–1950 : स्वतंत्रता और शुरुआती कूटनीति

  • 1947: अमेरिका ने स्वतंत्र भारत को मान्यता दी, पर शीतयुद्ध में भारत को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की।
  • ब्रिटेन और अमेरिका दोनों ने पाकिस्तान के साथ जल्दी से सामरिक नज़दीकी बनाई—यह भविष्य में भारत को घेरने की रणनीति का आधार बनी।

1950s : पाकिस्तान को "frontline ally" बनाना

  • 1954: अमेरिका–पाकिस्तान रक्षा समझौता; सैन्य मदद और आर्थिक पैकेज।
  • SEATO और CENTO के ज़रिये पाकिस्तान को एशिया में अमेरिका का प्रमुख सहयोगी बनाया गया—जिससे भारत की सैन्य-आत्मनिर्भरता चुनौती में आई।
  • ब्रिटेन ने कई इंटरनेशनल मंचों पर पाकिस्तान का साथ दिया; मुस्लिम-राष्ट्रों (सऊदी, ईरान (उस समय शाह का शासन था)) को भी पाकिस्तान के समर्थन के लिए प्रेरित किया गया।

1960s : चीन और पाकिस्तान के साथ संतुलन

  • 1962-63: चीन–भारत युद्ध के समय अमेरिका से सीमित सहयोग मिला, पर दीर्घकालिक झुकाव पाकिस्तान की ओर जारी रहा।
  • 1965: भारत–पाक युद्ध—अमेरिका ने दोनों पर हथियार आपूर्ति अस्थायी रूप से रोकी, पर पहले से दी गई सहायता का लाभ पाकिस्तान को हुआ।
  • 1965–66 में अनाज की कमी झेलते भारत को गेहूं आदि अन्न निर्यात पर नियंत्रण कर दबाव दिया, ध्यान देनेवाली बात है, अपनी जरूरत का 40% गेहूं भारत अमेरिका से आयात करता था। 
  • नेपाल, श्रीलंका में अमेरिकी कूटनीति व सहायता बढ़ी—भारत के क्षेत्रीय प्रभुत्व को चुनौती देने की शुरूआत।

1970s : 1971 युद्ध, ब्रिटेन व मुस्लिम राष्ट्रों का रोल

  • 1971: बांग्लादेश मुक्ति-युद्ध—निक्सन/किसिंजर ने पाकिस्तान का खुला समर्थन किया। USS Enterprise और 7th Fleet को बंगाल की खाड़ी भारत के खिलाफ भेजा था, शुक्र है USSR सामने खड़ा हो उसे वापस जाने को मजबूर कर दिया था। अमेरिका के सहयोग में आनेवाला ब्रिटिश बेड़ा सोवियत बेड़े की खबर सुन आधे रास्ते से ही लौट गया था। (उस समय के कमजोर भारत की स्थिति इराक सा बना सकता था)
  • ब्रिटेन और कई मुस्लिम-देशों (सऊदी, जॉर्डन, तुर्की आदि) को पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा किया गया—यह पठानखुर की कूटनीति का हिस्सा था।
  • 1974 के भारतीय परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने तकनीकी व वित्तीय प्रतिबंध लगाए।

1980s : अफगान युद्ध, ISI और कश्मीर में निहित असर

  • सोवियत–अफगान युद्ध में अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियार, फंड और ट्रेनिंग दी (ISI के जरिये)। यह नेटवर्क बाद में कश्मीर में सक्रिय हुआ।
  • भारत ने अमेरिका को बार-बार सबूत दिए कि पाकिस्तान आतंकवाद को फंड कर रहा है; पर अमेरिका ने अपनी रणनीतिक प्राथमिकता (सोवियत-विरोध) के कारण बहुत हद तक ये अज्ञात रहने दिया।
  • अमेरिकी सहायता ने पाकिस्तान को परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ाने के लिए साधन दिए—A.Q. Khan नेटवर्क की गतिविधियाँ अमेरिका के नजरिए में तथा सुरक्षा-लाभ के कारण अपेक्षाकृत अनदेखी रहीं।

1990s : पोस्ट–सोवियत युग, प्रतिबंध और फिर रिश्तों का नया मोड़

  • 1991: सोवियत संघ टूटा; भारत आर्थिक उदारीकरण में जुटा और पश्चिमी संस्थाओं (IMF/World Bank) के साथ निकट हुआ।
  • 1998: पोखरण-II के बाद अमेरिका (क्लिंटन प्रशासन) ने आर्थिक व तकनीकी प्रतिबंध लगाए; यूरोप और जापान को भी भारत से दूरी बनाने को कहा गया।
  • इसी दशक में अमेरिका ने अफगानिस्तान व पाकिस्तान में अपनी सैन्य प्राथमिकताओं के कारण क्षेत्रीय नीतियाँ जारी रखीं—जिसका असर भारत पर पड़ा।

2000s : आतंकवाद के खिलाफ युद्ध और दोहरा असर

  • 2001 के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को पुनः बड़े पैमाने पर समर्थन दिया—"Global War on Terror" के नाम पर। इससे कश्मीर में हिंसा और फंडिंग के चैनल सक्रिय रहे।
  • अमेरिका ने अफगानिस्तान में प्रभाव मजबूत किया—यह भारत के लिए जटिल परिणाम लेकर आया क्योंकि अमेरिका–पाकिस्तान तालमेल दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के पक्ष को मजबूत करता रहा।
  • 2005–08: भारत–अमेरिका सिविल न्यूक्लियर डील—संबंधों में बड़ा सुधार, पर क्षेत्रीय रणनीति में अमेरिका की उपस्थिति बढ़ी (Indo-Pacific रणनीति)।

2010s : साझेदारी गहरी लेकिन सियासी/व्यापारिक टकराव

  • USA–India defence ties बढ़े; "Major Defense Partner" का दर्जा मिला।
  • श्रीलंका, मालदीव, नेपाल में अमेरिका की आर्थिक/कूटनीतिक पहुंच बढ़ी—इन्हें कभी-कभी चीन के विरोध में, पर भारत के क्षेत्रीय प्रभुत्व को चुनौती देने हेतु भी उपयोग किया गया।
  • ट्रंप प्रशासन के दौरान व्यापारिक दबाव (GSP हटाना), H1B नीति कड़ाई से लागू करना—भारत के लिए आर्थिक व पॉलिसी चुनौतियाँ बनीं।

2020s : COVID, रूस-यूक्रेन, क्वाड और मिश्रित दबाव

  • COVID-19: वैक्सीन और दवाओं पर सहयोग भी और प्रतिस्पर्धा भी।
  • रूस–यूक्रेन (2022) के बाद अमेरिका ने यूरोप व ब्रिटेन के साथ मिलकर भारत पर रूस-आधारित तेल/ऊर्जा खरीद को लेकर दबाव डाला—पर भारत ने अपनी रणनीति जारी रखी।
  • QUAD व Indo-Pacific नीति के ज़रिये अमेरिका ने भारत के साथ सुरक्षा तालमेल बढ़ाया, पर साथ ही पाकिस्तान, मालदीव, नेपाल आदि में अपनी कूटनीतिक/वित्तीय पहुँच बनाये रखना जारी रखा—जिससे भारत की परिधि चुनौती में रही।
बांग्लादेश और नेपाल में सत्ता परिवर्तन में हाथ और सैन्य अड्डे बनाने की कोशिशों की भी बातें सुनने में आ रही हैं, जो गंभीर चिंता का विषय हैं। भविष्य में और साक्ष्यों की रोशनी में ही हम समझ पाएंगे कि कितनी सच्चाई है, फिलहाल उसे छोड़ दे रहा हूं।

तीसरे देशों के माध्यम से भारत के खिलाफ प्रमुख कदम

देश/गुट अमेरिका का रोल भारत पर असर
पाकिस्तान लंबे समय तक सैन्य व आर्थिक मदद; ISI को ट्रेनिंग/फंड कश्मीर में उकसावे, परमाणु कार्यक्रम को प्रोत्साहन, सीमा-तनाव
ब्रिटेन 1971 में पाक के पक्ष में राजनैतिक समर्थन; पश्चिमी गठबंधनों में साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत दबाव में आया
मुस्लिम राष्ट्र (सऊदी, तुर्की आदि) पाक के लिए वित्तीय/राजनैतिक समर्थन; कश्मीर पर वाक्-समर्थन भारत की मुस्लिम-विश्व में छवि को चुनौतियाँ; पारंपरिक राजनैतिक दबाव
अफगानिस्तान अमेरिकी उपस्थिति व तालिबान नीति के फैसले भारत की सुरक्षा हितों में चुनौतियाँ; पाकिस्तान-प्रायोजित नेटवर्क मजबूत
श्रीलंका, मालदीव, नेपाल, बांग्लादेश आर्थिक/कूटनीतिक मदद, निवेश; चीन-विरोधी नीति में रोल भारत के "क्षेत्रीय प्रभुत्व" पर दबाव व वैकल्पिक केंद्रों का निर्माण
यूरोप/ब्रिटेन परमाणु/टेक्नोलॉजी प्रतिबंधों का समर्थन; वाणिज्यिक दबाव 1998 के बाद भारत पर आर्थिक/राजनैतिक चुनौतियाँ


निष्कर्ष: अमेरिका – लाईलाज बीमारी का आधुनिक संस्करण!

पिछले दो दशकों में भारत-अमेरिका संबंधों में उल्लेखनीय बदलाव आया था, जो एक सतर्क संलग्नता से सुदृढ़ रणनीतिक साझेदारी तक पहुँच गया था। परन्तु एक बार फिर अमेरिका ने खुद ही दिखा दिया कि विश्वयुद्ध के बाद का अमेरिका का सत्ता बीमार नहीं, बल्कि एक लाइलाज बीमारी है। वही महामारी, जो कभी रोमन साम्राज्य और फिर ब्रिटिश साम्राज्य के रूप दिखा था — उसी का आधुनिक संस्करण अमेरिका है।

सबके संसाधनों से लाभ उठाना, परंतु ऊपर से अहंकार और श्रेष्ठता का प्रदर्शन—यही अमेरिकी नीति का शाश्वत स्वरूप है।

क्या अमेरिका वास्तव में किसी राष्ट्र को अपना समकक्ष मानता है? उसकी कथनी और करनी पर दृष्टि डालें तो उत्तर स्पष्टतः ‘नहीं’ में ही मिलता है। चाहे यूरोप हो, रूस हो, चीन हो या भारत—हर देश के प्रति उसका व्यवहार इस असमान दृष्टिकोण को उजागर करता है।

चीन उसके लिए सस्ते श्रम का असीमित कारख़ाना है; भारत—दक्षिण एशिया की कुंजी और चीन को चेतावनी देने का औज़ार; लैटिन अमेरिका उसकी पुरानी जागीर; और अफ़्रीका—एक विशाल प्रयोगशाला, जहाँ नई-नई औषधियों और तकनीकों का परीक्षण किया जाता है।

तेल और गैस से संपन्न देशों के लिए यह प्राकृतिक संपदा वरदान बनने के बजाय अभिशाप सिद्ध होती है; अमेरिका की नीतियाँ उन्हें अक्सर उलझनों और अस्थिरता में धकेल देती हैं। छोटे और निर्बल देशों की तो बात ही क्या, जब रूस जैसे विशाल और सामर्थ्यवान राष्ट्र को भी दबाने का प्रयास वह निरंतर करता रहता है।

पाकिस्तान और यूक्रेन के प्रसंगों में आश्चर्यजनक समानताएँ दिखाई देती हैं। भारत–रूस संबंधों की पृष्ठभूमि में देखें तो अमेरिकी चालें वही रहती हैं—बस परिदृश्य बदल जाता है। यदि कोई अपेक्षाकृत बड़ा देश उसके साथ कदम से कदम मिलाने को तैयार होता है, तो वह उसे उपयोग करके दूध की मक्खी-सा किनारे कर देता है। और यदि कोई राष्ट्र उसकी शर्तों के आगे झुकने को तैयार न हो, तो अमेरिका उनके विरोधियों को सहारा देकर उन्हें दबाने का प्रयास करता है।

पाकिस्तान इसका सजीव उदाहरण है: मान लीजिए कि रूस भी अमेरिकी शर्तों के आगे झुक जाए, तब भी यह निश्चित है कि कल को वही अमेरिका ‘यूक्रेन कार्ड’ खेलकर रूस को पुनः घेरने लगेगा।

आज की महत्ता और लाभ ही पर्याप्त नहीं; आने वाला कल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी राष्ट्र में स्वाभिमान, आत्मसम्मान और अडिग लगन है, तो अमेरिका भी अंततः उसी के पास हाथ मिलाने लौटेगा—इतिहास इसका साक्षी है।

मदद और सहयोग के नाम पर वह दोहन करता है, आदेश देता है; और यदि कोई राष्ट्र उसके हुक्म को ठुकरा दे, तो वह दमन के औज़ार निकाल लेता है।

यह आधुनिक संस्करण और भी अधिक शातिर है—दबाव डालता है, पर खर्च दूसरों से कराता है; अपने सहयोगियों से भी दबाव डलवाता है, और अंततः असली लाभ स्वयं हथिया लेता है।

जो उसके पिछलग्गू हैं, उनके लिए बस कुछ हड्डियाँ फेंक देता है; और जो उसके अधीन गुलाम बनकर रह जाते हैं, उनके लिए बचा-खुचा जूठन ही नियति है।

भारत से क्या उसने कभी सच्ची मित्रता की है? निजी वैमनस्य और क्षेत्रीय तनावों का लाभ उठाकर, वही खेल यहाँ खेलने की चेष्टा की — भारत को चीन के विरुद्ध उसी प्रकार खड़ा करने का, जैसे पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध खड़ा करता आया है। किन्तु इस बार भारत उसकी चालों में नहीं फँसा। कश्मीर की भाँति ही वह अपने सीमा-विवाद को द्विपक्षीय स्तर पर सुलझाने के सिद्धांत पर अडिग है।

सब कुछ स्पष्ट है— "प्रत्यक्षम किम प्रमाणं”। अमेरिका का स्वभाव और उसकी पहचान, जो कभी बदलती नहीं। प्रश्न यह है कि क्या भारतीय इन बातों की गहराई को समझ पाए हैं या भविष्य में समझ पाएँगे? या फिर शुतुरमुर्ग की भाँति आँखें मूँदकर केवल आज के लाभ में मग्न रहेंगे—आज प्रसन्न, कल विषाद में डूबे, तो इस चक्र में निरंतर घूमते रहेंगे। 

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