प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री
"मैं नहीं झुकेगा" का वास्तविक उदाहरण भारत के प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का काल (1964– 1966 – लगभग 19 महीने) छोटा अवश्य था, परंतु उन्होंने भारत को आत्मसम्मान, स्वावलम्बन और साहस का मार्ग दिखाया। अमेरिका के दबाव, भोजन की कमी और युद्ध जैसी त्रासदियों के बीच भी वे अडिग रहे।
1. प्रधानमंत्री पद (1964)
- 27 मई 1964 को पं. जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ।
- कांग्रेस में इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं के बीच मतभेद थे।
- संतुलित, सरल, और “समझौते के उम्मीदवार” के रूप में लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री चुने गए।
👉 चुनौतियाँ
उनका कार्यकाल छोटा (लगभग 19 माह) रहा, परन्तु इस दौरान देश ने गंभीर चुनौतियों का सामना किया:
- चीन युद्ध (1962) के बाद की सुरक्षा-चिंताएँ
- पाकिस्तान से बढ़ता तनाव – कश्मीर और सीमाई क्षेत्रों पर लगातार तनाव। पाकिस्तान का हमला (1965 का युद्ध)
- खाद्यान्न संकट (Food Crisis) – सूखे और बढ़ती जनसंख्या से देश में भुखमरी जैसी स्थिति।
- अंतर्राष्ट्रीय दबाव (विशेषकर अमेरिका द्वारा)
2. भारत में भोजन संकट (1964–66)
1960 के दशक के मध्य में भारत "अनाज की भारी कमी" से जूझ रहा था।
👉कारण:
- लगातार "सूखा" (1965 और 1966 के मानसून कमजोर रहे) – कृषि उत्पादन घटा।
- कम उत्पादन क्षमता पारंपरिक खेती, उन्नत बीज व सिंचाई का अभाव।
- "कृषि उत्पादन पर कम ध्यान" (नेहरू काल में उद्योग और भारी मशीनों पर अधिक निवेश हुआ था)
- "जनसंख्या वृद्धि"
- आधुनिक कृषि तकनीक और उच्च उत्पादक बीजों की कमी।
👉परिणाम:
- देश को भारी मात्रा में "गेहूँ और चावल आयात" करना पड़ा।
- भारत लगभग पूरी तरह से अमेरिका के "PL-480 कार्यक्रम" (Public Law 480 – Food for Peace) पर निर्भर हो गया था।
- भोजन समस्या और अमेरिका का दबाव
👉 PL-480 योजना
- अमेरिका इस योजना के अंतर्गत गरीब देशों को गेहूँ, चावल और अन्य अनाज सस्ते दामों पर देता था।
- भारत 1960 के दशक में इस योजना पर सबसे अधिक निर्भर देशों में से एक था। करीब 40% अपने जरूरत का गेहूं USA से आयात करता था।
# अमेरिका चाहता था कि
- "भारत की कृषि नीति और अर्थव्यवस्था को अपने अनुसार ढालना" – अमेरिका चाहता था कि भारत कृषि में “Green Revolution” अपनाए, पर उसकी शर्तों और तकनीक/बीजों पर निर्भर रहे।
- "भारत की अर्थव्यवस्था को अपने अनुसार ढालना" – भारत उसका बाजार बने और उसके लिए कानूनों और नियमों में बदलाव करे।
- "सोवियत संघ से दूरी" बढ़े – भारत और रूस की बढ़ती निकटता से अमेरिका असहज था। वह खाद्यान्न को दबाव बनाने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल कर रहा था।
- "दबाव" बना रहा था कि – वियतनाम युद्ध (1960s) में भारत आलोचना नहीं बल्कि उसका समर्थन करे।
- गुट निरपेक्षता की नीति छोड़ उसकी तरफ झुके। सीधे शब्दों में कहें तो जैसा वो कहे वैसा भारत करे।
👉 अमेरिका के दबाव डालने के तरीके
- 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान अमेरिका ने "दोनों देशों को अनाज और हथियारों की आपूर्ति रोक दी।"
- अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारत को गेहूं की आपूर्ति रोकने की धमकी दी थी, लेकिन भारत के प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दृढ़ता से जवाब दिया था, "हमारे पास गेहूं नहीं है तो नहीं, लेकिन हम अमेरिका से गेहूं नहीं लेंगे!"
- 1966 में राष्ट्रपति "लिंडन बी. जॉनसन (Lyndon B. Johnson)" ने नीति बनाई—"“Ship-to-Mouth”"।
मतलब साफ था: भारत को “भुखमरी का डर” पैदा कर दबाव बनाने के लिए एक बार में थोड़ा ही अनाज देगा, उतना ही भेजेगा कि कुछ ही सप्ताह के लिए भारत की जनता पेट भर सके।
👉 शास्त्री जी ने इस दबाव को चुनौती दी:
- अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारत को गेहूं की आपूर्ति रोकने की धमकी पर शास्त्री जी ने दृढ़ता से जवाब दिया था, "हमारे पास गेहूं नहीं है तो नहीं, लेकिन हम अमेरिका से गेहूं नहीं लेंगे!"
- इस बयान का दीर्घकालिन महत्त्व :
- आत्मनिर्भरता: इस घटना ने भारत को आत्मनिर्भरता और अपनी खाद्य सुरक्षा के महत्व को समझने के लिए प्रेरित किया।
- भारत की प्रतिष्ठा: शास्त्री जी के इस बयान ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाई और भारत की संप्रभुता और आत्मसम्मान को दर्शाया।
- सांस्कृतिक प्रभाव: यह घटना आज भी भारतीयों द्वारा गर्व के साथ याद की जाती है।
- जनता से अपील की —“एक दिन उपवास”, आत्मनिर्भरता, “सादा जीवन, स्वदेशी अन्न”
- किसानों को सम्मान देते हुए नारा दिया—“जय जवान, जय किसान”। उन्होंने युद्ध में किसानों और जवानों की भूमिका को बराबरी का दर्जा दिया।
- हरित क्रांति की नींव डाली। डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन, नॉर्मन बोरलॉग जैसे वैज्ञानिकों से बातचीत कर प्लान बनाया।
- सिंचाई, उच्च गुणवत्ता बीज पर जोर दिया। मैक्सिकन गेहूं की किस्में लाई गईं।
- भारत में कृषि अनुसंधान, उच्च उत्पादक बीजों, सिंचाई और खाद पर काम शुरू हुआ।
- FCI और CACP की नींव भारतीय खाद्य निगम (FCI) और कृषि लागत व मूल्य आयोग (CACP) की रूपरेखा तैयार। वितरण प्रणाली मजबूत हुई।
- गुटनिरपेक्ष नीति पर डटे रहे।
- अमेरिका के दबाव में नहीं आए।
- सोवियत संघ और अन्य देशों से संतुलित सम्बन्ध बनाए।
4. 1965 का भारत–पाक युद्ध
- अप्रैल 1965 – पाकिस्तान ने “ऑपरेशन डेजर्ट हॉक” (कच्छ रण में घुसपैठ) शुरू किया।
- अगस्त 1965 – पाकिस्तान ने “ऑपरेशन जिब्राल्टर” के तहत कश्मीर में घुसपैठ कराई।
- भारत ने दृढ़ता से जवाब दिया। युद्ध पूरे पश्चिमी मोर्चे तक फैल गया।
- भारतीय सेना ने लाहौर और सियालकोट तक पहुँचकर पाकिस्तान को गहरी चोट दी।
- शास्त्री जी का दृढ़ नेतृत्व क्षमता को दुनिया ने देखा:
- उन्होंने सेना को खुला आदेश दिया—“सीमा पार करने में संकोच न करें, आक्रामकता का पूरा जवाब दें।”
- आम जनता को संबोधित कर कहा: “यदि हमें बलिदान देना पड़े तो देंगे, पर देश की भूमि और सम्मान की रक्षा करेंगे।”
परिणाम:
- पाकिस्तान की रणनीति विफल हुई।
- युद्धविराम (ceasefire) के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ा।
- अमेरिका और ब्रिटेन ने दोनों देशों पर हथियारों की आपूर्ति रोक दी। (नोट: मुख्यतः पाकिस्तान को हथियार देते थे, भारत–चीन युद्ध के बाद थोड़ा भारत को भी।)
5. ताशकंद समझौता (जनवरी 1966)
- युद्धविराम के बाद सोवियत संघ ने मध्यस्थता की।
- 4–10 जनवरी 1966 – सोवियत प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन की मध्यस्थता में ताशकंद (उज़्बेकिस्तान) में भारत–पाक वार्ता हुई।
- शास्त्री जी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान ने ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर किए:
- दोनों देश युद्ध से पहले की स्थिति (pre-war position) पर लौटेंगे।
- आर्थिक और कूटनीतिक संबंध पुनः स्थापित होंगे।
- शांति बनाए रखने की सहमति दी गई।
6. लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु
- 11 जनवरी 1966 की मध्यरात्रि को ताशकंद समझौते के तुरंत बाद शास्त्री जी का अचानक निधन हो गया।
- आधिकारिक कारण: हृदयाघात (heart attack) बताया गया।
- किन्तु उनकी मृत्यु आज भी रहस्य और विवाद का विषय है—क्योंकि यह अचानक हुई और परिस्थितियाँ संदेहास्पद थीं।
- मृत्यु पर पूरा देश स्तब्ध रह गया था — जिनका इतना छोटा कार्यकाल, पर इतना बड़ा योगदान था।
7. विरासत
- “जय जवान, जय किसान” – आज के भारत की आत्मनिर्भरता और सुरक्षा नीति का आधार।
- आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की दिशा – भोजन संकट से निकलने के लिए हरित क्रांति की नींव डाली। उनकी सोच थी—“दूसरों पर निर्भर रहने से बेहतर है कि कठिनाई झेलकर भी आत्मनिर्भर बनें।”
- दृढ़ परन्तु शांत नेतृत्व – सीमित संसाधनों में भी 1965 का युद्ध जीतना।
- गुटनिरपेक्ष पर दृढ़ विश्वास – अमेरिका के दबाव में न झुकना।
- ईमानदार छवि – वे प्रधानमंत्री जिन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर देशहित को सर्वोच्च रखा।

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