1991 के बाद अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा और यूरोप के कई पूर्व उपनिवेशवादी देश उस वैश्विक व्यवस्था के अनुकूल हो गए। सोवियत संघ के विघटन के बाद नाटो (NATO) का विस्तार तेज़ हुआ — 1999 में पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य जैसे देशों का प्रवेश और आगे 2004, 2009, 2017, 2024 तक सदस्यता-वृद्धि होती रही। इस विस्तार ने पश्चिमी रक्षा ढांचे को रूस की सीमाओं तक पहुँचा दिया।
यूरोप और रूस के बीच सहयोग के वर्षों में वैश्विक स्थिरता बनी रही, लेकिन इस स्थिरता से पश्चिमी हथियार उद्योगों के मुनाफे में गिरावट आई। “लोकतंत्र बनाम साम्यवाद (Communism)” जैसे वैचारिक संघर्ष के पुराने नारों की चमक फीकी पड़ चुकी थी। इस बीच आतंकवाद और इस्लामी चरमपंथ जैसे नए “वैश्विक खतरे” प्रस्तुत किए गए, जिनके बहाने सैन्य अभियानों और रक्षा खर्चों को वैध ठहराया गया — पर धीरे-धीरे इन अभियानों के वास्तविक लाभ और मंशा पर सवाल उठने लगे।
