यूरोप और रूस के बीच सहयोग के वर्षों में वैश्विक स्थिरता बनी रही, लेकिन इस स्थिरता से पश्चिमी हथियार उद्योगों के मुनाफे में गिरावट आई। “लोकतंत्र बनाम साम्यवाद (Communism)” जैसे वैचारिक संघर्ष के पुराने नारों की चमक फीकी पड़ चुकी थी। इस बीच आतंकवाद और इस्लामी चरमपंथ जैसे नए “वैश्विक खतरे” प्रस्तुत किए गए, जिनके बहाने सैन्य अभियानों और रक्षा खर्चों को वैध ठहराया गया — पर धीरे-धीरे इन अभियानों के वास्तविक लाभ और मंशा पर सवाल उठने लगे।



